उड़ते हैं,दूर जाते हैं फिर लौट आते हैं घोंसलों में इन परिंदों का अपना कभी ये आस्मां नहीं होता हमारे और तुम्हारे बीच में एक दर्द का रिश्ता है जो दिल में दर्द न होता तो कोई रिश्ता नहीं होता हम शुक्रमंद हैं हमेशा अपनी सारी गलतियों के जो वे गलतियाँ न होतीं तो ये …
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कविवार (My Sunday Poetry)
इन कोहरों के बीच एक धुँधला रस्ता दिखता है जो जाता है सीधा सूर्य की पहली किरण तक मैंने शब्दों के फैलाव को देखा है छूकर हाथों से वो पहुँच ही पाएँ न कभी मौन के आवरण तक तुम अपने ह्रदय में जैसी तरंगें उठाया करते हो वही भाव पसर जाता है धरती तक, गगन …
कविवार(My Sunday Poetry)
लम्हों के सिलसिलों में कुछ भी न ठहर पाएगा वो भी गुजर गया था, ये भी गुजर जाएगा तुमने जो बातें कही, वो खत्म नहीं होंगी कभी बातों में जो असर था,दूर तक वो असर जाएगा भीड़ में अपना चेहरा मिलाने से पहले सोच लो तू अब से बस भीड़ का ही हिस्सा नजर आएगा …
कविवार (My Sunday Poetry)
कोई और वजह है ही नहीं तुम्हारी शिकायत करने की तुम कुछ ज्यादा ही सुंदर हो बस इतनी-सी शिकायत है मैं तुम्हें कैसे बताऊँ तोल कर अपनी चाहत की तासीर को बस जिंदगी से थोड़ी-सी ज्यादा है,ये जो तुमसे मोहब्बत है एक दूजे को देखकर इन दिनों वो हँसते हैं कुछ ज्यादा ही हमे यकीन …
कविवार (My Sunday Poetry)
जीते-जीते जब हम जीने लगे तब ये जाना इस दुनिया को हम दुनिया समझ लिए हद से ज्यादा। हार आखिर न थी, जीत अंतिम न थी दुःख रहा भी नहीं, सुख बसा भी नहीं फिर भी जाने क्यूँ इनकी वजह से यूँ ही हम रो लिए हद से ज्यादा, हँस लिए हद से ज्यादा। तेरे …
कविवार (My Sunday Poetry)
तुमने मेरे भीतर जितना कुछ पाना चाहा है हम उससे ज्यादा तुझमे अपना खो कर बैठे हैं एक हादसा भूलने को हमें दूसरा हादसा चाहिए हम इन हादसों के इतने आदी हो कर बैठे हैं इस दरिया के पार जाने की जिन्हें इतनी पड़ी है वो पहले से अपनी नाव खुद ही डुबो कर बैठे …
कविवार (My Sunday Poetry)
यूँ तो शिकायतें हमें पहले भी कम न थीं मगर सुना है, तेरे शहर की हवा अब ज्यादा खराब है इन चेहरों पर पहले से ही जाने कितने नकाब थे मगर इन दिनों नकाबों के ऊपर एक और नकाब है इस भागदौड़ की कोई मंजिल दिखी नहीं अब तक कभी पहुँचना कहीं नहीं है, बस …
कविवार (My Sunday Poetry)
हर बार किसी भरोसे की कोई जरूरी वजह नहीं होती आसमां रंग नहीं बदल लेता है मौसम के बदल जाने से इन समंदरों में कहाँ दम था कि बढ़ पाएँ अपने कगारों से ये दुनिया तो डूबती है बस दो बूँद आँसू के पिघल जाने से तेरा प्यार एक भरम था, ये हमें मालूम था …
कविवार (My Sunday Poetry)
जिंदगी ऐसे जिओ कि कोई कहानी बन जाए पर्वत पिघल जाए मोम-सा और आग पानी बन जाए यूँ तो इस रेत पर कितने पैरों के निशां बिगड़े-बने पर तू ऐसा कदम रख कि पत्थर पर निशानी बन जाए तेरे हौसलों की हनक कुछ ऐसे उड़े इस संसार में तू ही जमीं के जर्रों में हो, …
कविवार (My Sunday Poetry)
जमीं के हर टुकड़े के हिस्से में आसमान नहीं होता इस दुनिया में सब कुछ इतना आसान नहीं होता तेरी गली का पता मैं कभी पूछता नहीं इन लोगों से अगर उस गली के छोर पर तेरा मकान नहीं होता माना हम अजनबी हैं मगर हमें गैर न समझो तुम हर अजनबी इस दुनिया में …