कविवार (My Sunday Poetry)

हर ओर सिहरन है, रुदन है, भय है और संशय हैभला यह कैसी विश्व विजय है ! दो कदम बढ़े थे आगेअब चार कदम पीछे हैंकल अंबर के ऊपर थेआज धरती के नीचे हैं जिन आँखों में राजदम्भ था, आज वहाँ विस्मय हैभला यह कैसी विश्व विजय है ! इच्छाओं के अन्वेषण मेंकुछ इतनी दूर …

कविवार (My Sunday Poetry)

भरोसे की हद अब कहो, क्या बताएँ तुम्हें हमखुद से भी पूछा न तुम्हें अपना बनाने से पहले ये तमन्ना है, तेरी मदहोशी में यूँ ही डूबे रहे हमये दुनिया ही खत्म हो जाए होश आने से पहले हाथ मिलाना,गले लगना ये काम आसां बड़ा हैवो बस ठिठक जाते हैं नजरें मिलाने से पहले इन …

कविवार (My Sunday Poetry)

इसी गली में धूप खिली,छोर पर एक उगा सितारा भी थाजो शहर जलाया तुमने, वो शहर तुम्हारा भी था। इन खून के तरल धारों सेजिसने अपनी प्यास बुझाईइन तेजाबों की बारिश मेंजिसने सीने में ठंडक पाई उनसे कह दो जो जितना जीता, वह उतना हारा भी थाजो शहर जलाया तुमने, वो शहर तुम्हारा भी था। …

कविवार (My Sunday Poetry)

कोशिश की है दिल से तो उसका असर भी होगाप्यास इतनी गहरी है तो सामने समंदर भी होगा दूसरों के घर की आग में यूँ रौशनी खोजने वालोंये मत भूलो कि किसी बारी में तेरा घर भी होगा उन्हें इतना अपना माना कि हम सोच तक न पाएँकि वो दुश्मन हमारा एक रोज इस कदर …

कविवार (My Sunday Poetry)

तुम सांझ बनकर इन दहकती गलियों में आ जानामैं रात बनकर तुम्हें अपनी इन बांहों में छुपा लूंगा इन जागती हुई सच्चाइयों के रस्ते बहुत ही लम्बे हैंमैं सपनों के रस्ते से तुमको पल भर में बुला लूंगा रोज वो मिलते हैं मगर अब तक हाल भी नहीं पूछासोचा है,आज बिन पूछे ही उन्हें सब …

कविवार (My Sunday Poetry)

कुछ सामान अभी भी बंद हैं दिल के संदूकों के भीतरये मुमकिन नहीं कि तुम खरीद लो सब कुछ बाजारों से हमने चांद पाने की कोशिश में इसलिए ये हाथ बढ़ाएमुट्ठी भर ही जाएंगी कम-से-कम इन‌ बिखरे सितारों से न‌ फुर्सत है,न सब्र है कि कोई सुनेगा बात तुम्हारे मन कीइसलिए इन दिनों दिल की …

कविवार (My Sunday Poetry)

मैंने लाख कोशिश की तुम्हें कहीं जाहिर न होने दूंमगर मेरी हर दास्तां में जाने क्यूं तेरा नाम आता है मुझसे बोलो, न बोलो बस हंस कर देख ही लो तुमतुम्हारे यूं देखने भर से ही दिल को आराम आता है जो फूल गिर गया जमीन पर उसे बेमोल न समझोटूटा हुआ फूल भी एक …

कविवार (My Sunday Poetry)

‌संध्या को इन किरणों ने रक्तिम गुलाबी कर दियाभोर में स्वर्णिम आभा ने कोष नभ का भर दियान रजत की रश्मियां,न मणियों की मनुहार मांगूंबस मुझे आज थोड़ा रंग बासंती कर देना। ओस की मधु-बिंदुओं के भीतर उत्तप्त आग देखामैंने पराजय की थकन में विजय का अनुराग देखान निराशा का धुंधलका,न आशा की चकाचौंध चाहूंबस …

कविवार (My Sunday Poetry)

हम तेरी मोहब्बत में तेरे हो गए हैं इतना ज्यादा कि अब आईने में भी तेरी ही सूरत नजर आती है इन आँखों में नींद वाली कभी रात नहीं आती है सुना है,तेरी चौखट पर ही अब शाम ठहर जाती है जिंदगी के लम्हे कभी मुश्किल न थे जीने के लिए जाने क्यों ये लम्हे …

कविवार (My Sunday Poetry)

हाँ,ये सच है कि गाँव के आँगन में एक दीवार पड़ चुकी है और दोनों हलकों की सारी जमीन बंट चुकी है बराबर-बराबर मेरे और तुम्हारे मकान भी अब अलग-अलग हैं मगर भाई अब भी तू मेरा ही है, मैं तेरा ही हूँ। तुम उस शहर में बस गए,मैं इस शहर में बस गया तुम्हारे …

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