कच्चा मकान था तो इत्मीनान था पक्के मकानों में थोड़ी नींद कम आती है इन कमरों में उजाले की यूँ तो कमी नहीं है बस कुछ चाँद कम दिखता है,थोड़ी धूप कम आती है। बारिशों से बचने को एक छत क्या ढाला हमने कई दिन बीते मगर बारिश में भींग ही न पाएँ हम दिन …
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कविवार (My Sunday Poetry)
जन्नत के बरसों की मन्नत आज हो गयी है पूरी अब हिमालय की वादी कुछ साँस अधिक लेगी रावी के जल में भी एक आदिम-सी हलचल है ये जो नक्शे हैं कागज के,उनकी सूरत बदलेगी। आखिर ये धारा कैसी धारा है जिसने अपना ही घर बिगाड़ा है कोई संधि, कोई कानून नहीं जो हमारा था, …
कविवार (My Sunday Poetry)
जब तक प्यार न हो जाए ये तकरार ही चलने दो इसी बहाने कुछ दिन अपना वास्ता तो होगा ये बात और है कि तुम तक कभी हम पहुँच पाए नहीं मगर तुम हो तो तुम तक पहुँचने का कोई रास्ता तो होगा जानते हो,ये फूल क्यूँ लुटाते हैं सुगंध इन फिजाओं में उन्हें है …
कविवार (My Sunday Poetry)
हाँ,खुद पर हमने इतना सितम कर दिया है तुम्हें सोचना थोड़ा कम कर दिया है जहाँ पर हुईं थी शुरू बातें ये सारी वहीं जाकर उनको खतम कर दिया है तुम्हें सोचना थोड़ा कम कर दिया है ! मेरी आँखों के आँसू न पहचाने कोई मैंने बारिशों से आँखों को नम कर दिया है तुम्हें …
वे मिले भी तो क्या मिले
इतने अरसे बीते,वे मिले भी तो क्या मिले जब भी मिले बस यादों के दरमियां मिले जो भी बीती,हम पर बीती,वो सबसे क्यूँ कहूँ लोग बैठे हैं कि उन्हें हँसने का एक मौका मिले अपने गाँव की जमीन और आँगन वो बेच आया है कि इस शहर में उसे दो कमरे का एक मकां मिले …
मैंने कब चाहा था
मैंने कब चाहा था,ये सारा चमन हो मेरा दो मुट्ठी आसमान को मेरे नाम कर दो बस इतना ही बहुत है ! लरजते दिन तुम्हारे हों,खनकती रात तुम्हारी हो मेरे हिस्से में तुम एक रंगीन शाम कर दो बस इतना ही बहुत है ! सुना है, शोहरत की जमीन भरी हुई है फिसलनों से इन …
साँसों के सिलसिले में जाने कौन अंतिम कड़ी हो…..
साँसों के सिलसिले में जाने कौन अंतिम कड़ी हो हर साँस को इसलिए हम बड़ी शिद्दत से जीते हैं हर कदम पर मौत ने बाजी बिछा रक्खी यहाँ जो जीते हैं दुनिया में वो बस किस्मत से जीते हैं इन मंज़रों में डूब जाना आसां बहुत है यारों इन मंज़रों से निकलते हैं वही जो …
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जिन्हें इस काफिले के जश्न से तकलीफ है…..
जिन्हें इस काफिले के जश्न से तकलीफ है उन्हें कह दो कि ये काफिले यूँ ही नहीं बनते कड़ी धूप में चिड़ियों ने चमन से चुने थे तिनके सूखी डाल पर ये सुंदर घोंसले यूँ ही नहीं बनते तुमने उनसे कभी दिल से बातें की नहीं होंगी रिश्तों के बीच के ये फासले यूँ ही …
ग़ज़ल
मत पूछो इन गलियों से गुजरा हूँ कितनी बार फिर भी जाने क्यों लोग मुझे अजनबी समझते हैं दुनिया वालों की सोच से मैं अपनी फितरत क्यूं बदलूँ कुछ गलत समझते हैं तो कुछ सही समझते हैं तुम्हारा नाम तुम्हारे लिए बस नाम भर होगा हम तो तुम्हारे नाम को ही ज़िन्दगी समझते हैं सितारों …