कविवार (My Sunday Poetry)

कोशिश की है दिल से तो उसका असर भी होगाप्यास इतनी गहरी है तो सामने समंदर भी होगा दूसरों के घर की आग में यूँ रौशनी खोजने वालोंये मत भूलो कि किसी बारी में तेरा घर भी होगा उन्हें इतना अपना माना कि हम सोच तक न पाएँकि वो दुश्मन हमारा एक रोज इस कदर […]

कविवार (My Sunday Poetry)

तुम सांझ बनकर इन दहकती गलियों में आ जानामैं रात बनकर तुम्हें अपनी इन बांहों में छुपा लूंगा इन जागती हुई सच्चाइयों के रस्ते बहुत ही लम्बे हैंमैं सपनों के रस्ते से तुमको पल भर में बुला लूंगा रोज वो मिलते हैं मगर अब तक हाल भी नहीं पूछासोचा है,आज बिन पूछे ही उन्हें सब […]

कविवार (My Sunday Poetry)

कुछ सामान अभी भी बंद हैं दिल के संदूकों के भीतरये मुमकिन नहीं कि तुम खरीद लो सब कुछ बाजारों से हमने चांद पाने की कोशिश में इसलिए ये हाथ बढ़ाएमुट्ठी भर ही जाएंगी कम-से-कम इन‌ बिखरे सितारों से न‌ फुर्सत है,न सब्र है कि कोई सुनेगा बात तुम्हारे मन कीइसलिए इन दिनों दिल की […]

कविवार (My Sunday Poetry)

मैंने लाख कोशिश की तुम्हें कहीं जाहिर न होने दूंमगर मेरी हर दास्तां में जाने क्यूं तेरा नाम आता है मुझसे बोलो, न बोलो बस हंस कर देख ही लो तुमतुम्हारे यूं देखने भर से ही दिल को आराम आता है जो फूल गिर गया जमीन पर उसे बेमोल न समझोटूटा हुआ फूल भी एक […]

कविवार (My Sunday Poetry)

‌संध्या को इन किरणों ने रक्तिम गुलाबी कर दियाभोर में स्वर्णिम आभा ने कोष नभ का भर दियान रजत की रश्मियां,न मणियों की मनुहार मांगूंबस मुझे आज थोड़ा रंग बासंती कर देना। ओस की मधु-बिंदुओं के भीतर उत्तप्त आग देखामैंने पराजय की थकन में विजय का अनुराग देखान निराशा का धुंधलका,न आशा की चकाचौंध चाहूंबस […]

कविवार (My Sunday Poetry)

हम तेरी मोहब्बत में तेरे हो गए हैं इतना ज्यादा कि अब आईने में भी तेरी ही सूरत नजर आती है इन आँखों में नींद वाली कभी रात नहीं आती है सुना है,तेरी चौखट पर ही अब शाम ठहर जाती है जिंदगी के लम्हे कभी मुश्किल न थे जीने के लिए जाने क्यों ये लम्हे […]

कविवार (My Sunday Poetry)

हाँ,ये सच है कि गाँव के आँगन में एक दीवार पड़ चुकी है और दोनों हलकों की सारी जमीन बंट चुकी है बराबर-बराबर मेरे और तुम्हारे मकान भी अब अलग-अलग हैं मगर भाई अब भी तू मेरा ही है, मैं तेरा ही हूँ। तुम उस शहर में बस गए,मैं इस शहर में बस गया तुम्हारे […]

कविवार (My Sunday Poetry)

उड़ते हैं,दूर जाते हैं फिर लौट आते हैं घोंसलों में इन परिंदों का अपना कभी ये आस्मां नहीं होता हमारे और तुम्हारे बीच में एक दर्द का रिश्ता है जो दिल में दर्द न होता तो कोई रिश्ता नहीं होता हम शुक्रमंद हैं हमेशा अपनी सारी गलतियों के जो वे गलतियाँ न होतीं तो ये […]

कविवार (My Sunday Poetry)

इन कोहरों के बीच एक धुँधला रस्ता दिखता है जो जाता है सीधा सूर्य की पहली किरण तक मैंने शब्दों के फैलाव को देखा है छूकर हाथों से वो पहुँच ही पाएँ न कभी मौन के आवरण तक तुम अपने ह्रदय में जैसी तरंगें उठाया करते हो वही भाव पसर जाता है धरती तक, गगन […]

कविवार(My Sunday Poetry)

लम्हों के सिलसिलों में कुछ भी न ठहर पाएगा वो भी गुजर गया था, ये भी गुजर जाएगा तुमने जो बातें कही, वो खत्म नहीं होंगी कभी बातों में जो असर था,दूर तक वो असर जाएगा भीड़ में अपना चेहरा मिलाने से पहले सोच लो तू अब से बस भीड़ का ही हिस्सा नजर आएगा […]

Create your website at WordPress.com
Get started