कविवार (My Sunday Poetry)

कर्ण की अंतिम सुबह आज युद्ध निर्णायककुरु के म्लान सैन्यदलों का अब मैं ही सेनानायकआज युद्ध निर्णायक। कर्म और कर्त्तव्य की कुछ भिन्न गति है,नहीं जानताधर्म या फिर धारणा में छिपी उन्नति है, नहीं जानताउधर केशव का शिविर, इधर सुयोधन है शिविरपतिकिधर प्रगति है और किधर अवनति है,नहीं जानता। अब कुछ और न कहेगी जिह्वा, […]

कविवार (My Sunday Poetry)

इनकी हस्ती ही क्या है, ये गर्दिशों के जमाने जाएँगेंबात तो बिगड़ेगी नहीं,बस कुछ लोग पहचाने जाएँगें इन हरी डालियों ने छिपा रखे कितने काँटे गिरेबां मेंलोग देख ही लेंगे सारे, जब भी ये पत्ते पुराने जाएँगें ये दिल के दर्द की बात है, कोई व्यर्थ अफसाना नहींजब तुमने ही पूछा नहीं तो हम किसे […]

कविवार (My Sunday Poetry)

जो मेरे भीतर है वो मेरा कितना अपना हैजमाने को मैं भला यह राज बता दूँ कैसे दिल का दर्द ही मेरी उम्र भर की पूँजी हैतुम्हें सुना कर इस पूँजी को लुटा दूँ कैसे जो जता दिया वो सौदा है, प्यार है ही नहींप्यार उनसे है तो उनको प्यार जता दूँ कैसे आँसुओं में […]

कविवार (My Sunday Poetry)

बात अपने दिल की बहुत सारी कहनी थी उनकोबातों का सिलसिला वो थोड़ा आगे बढ़ाते तो सही उन्हें एक बार फिर समेट कर सँवार देते हम जरूरटूट कर वो हमारे सामने कभी बिखर जाते तो सही हमने सुना है, मोहब्बत पर अब यकीन नहीं उनकोये यकीन करने से पहले वो हमें आजमाते तो सही अपना […]

कविवार (My Sunday Poetry)

कैसे कह दूँ मैं कि इस सफर में कितने मोड़ आए हैंजितना हासिल है, उससे ज्यादा पीछे छोड़ आए हैं हर ठहराव पर जितने नये रिश्ते बना लिए हैं हमनेउनसे ज्यादा कई पुराने रिश्तों को हम तोड़ आए हैं चमकती चाँदनी की रौशनी में इतरा रहे हैं जो लोगवे अभी शाम में धूप की परतों […]

कविवार (My Sunday Poetry)

यशोधरा के प्रति आलि!ये जो अश्रुबिंदु दृग-द्वार से मेरे अनुगत हुए हैंये हर्ष का दुंदुभि नाद है, मेरे सिद्धार्थ तथागत हुए हैं। यह नहीं सत्य, उन्होंने त्यज दिया मुझेया मैं उनका किंचित भी व्यवधान बनीसत्य है यह उनके सचेतन आरोहण मेंमैं भाग्यवती उनका प्रथम सोपान बनी इस आरोहण से बहुविध ताप जगत के विगत हुए […]

कविवार (My Sunday Poetry)

खुद राह पर चलते नहीं और रहबर का पता पूछते हैंकिनारे पर खड़े होकर भी वे समंदर का पता पूछते हैं अपनी हद से ऊपर कभी उठ भी न पाएँ जरा-सा वोमगर सुना है, इन दिनों सबसे अंबर का पता पूछते हैं किसी तरह से वे महफिल में एक नजर देख लें हमकोउनकी नजरों से […]

कविवार (My Sunday Poetry)

यूँ ही नहीं हमने आपको कर डाला इस हद तक मजबूरबिना शिद्दत के कभी ख्वाहिशों में असर पैदा नहीं होता मेरे दिल को समझना है तो ठहर कर मेरे नयनों को देखोदिल तो एक बंद कोठरी है,इसमें कोई झरोखा नहीं होता हम जीतें या हारें, हमारी कोशिश जग याद रखेगा बरसोंआग बुझ जाने भर से […]

कविवार (My Sunday Poetry)

बाजार में तुम दो पल ठहर कर देख लो हमकोआज हम भी इस शहर में जरा मशहूर हो जाएँ तेरे चेहरे से जुल्फें हटाना हमारा कसूर ही सहीये कसूर एक बार कर लें, फिर बेकसूर हो जाएँ हर हार एक और कोशिश करने का ही इशारा हैन जाने किस कोशिश में अर्जियाँ मंजूर हो जाएँ […]

कविवार (My Sunday Poetry)

ये कैसा बीसवां साल लगा ! न सपनों का व्यापार हुआन उत्सव, न त्यौहार हुआन बाजारों में मेले ही दिखेना ही झूलों का जाल लगाये कैसा बीसवां साल लगा ! न सफर हुआ,न सवारी चलीन द्वार खुले,न खिड़की खुलीबच्चों के शोर-शराबे के बिनाये मोहल्ला बेजार,बेहाल लगाये कैसा बीसवां साल लगा ! वो मिले कभी तो […]

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