कविवार (My Sunday Poetry)

कुछ सावन यहाँ बिन बरसे ही बीत गएकुछ कलियाँ बिन खिले ही झुलस गईंकुछ दीप जले बिन टूट गए चौखट परकुछ मालाएँ गूँथने से पहले बिखर गईं तुमको देखा और तुम्हारे सपने भी देखे इस कहानी की बस इतनी ही कहानी हैजो बात मन में है वह मन में ही रहने दोन तो तुम्हें सुननी …

कविवार (My Sunday Poetry)

कुछ पल ऐसे भी आते हैंआँसू भी थाती बन जाते हैंदुःख जब हद से गुजरता हैवो ह्रदय को पत्थर करता हैइतिहास खुद को दुहराता हैकुछ भूली हुई बात बताता हैसमय के बहुत-से झरोखे हैंये दौर हम पहले भी देखे हैंकल जैसी ही यह कहानी हैआज फिर आँखों में पानी हैये कैसी अजब-सी लाचारी हैजाने किसकी …

कविवार (My Sunday Poetry)

नैया ये डगमग डोल रहीये दिशाएँ रौरव बोल रहींगर्जन-तर्जन, हुंकार उठासागर में हाहाकार उठाहे नाविक,तुम फिर भी छोड़ पतवार न जानाकुछ भी हो जाए बस हिम्मत हार न जाना। समय ने संजाल रचाया हैहमसे कुछ भेद छिपाया हैये जाल सघन हम तोड़ेंगेंसमय का रुख भी मोड़ेंगेंभाग्य पर अपना भूल सहज अधिकार न जानाकुछ भी हो …

कविवार (My Sunday Poetry)

बहुत आँसू बरसे, बहुत आह निकलीखोजा मगर ना कोई भी राह निकलीबहुत रुदन-क्रंदन,करुण विलाप देखासाँसों में घुटन और मन में संताप देखा प्रलय के प्रहर को अब तो पार कर दोहे दाता!हे ईश्वर!अब उबार कर दो। तुम्हीं ने रचाया है और तुम्हीं ने सजायाये जो कुछ बना है,सब तुम्हीं ने बनायातेरी ही रचना है, इसे …

कविवार (My Sunday Poetry)

मैं कुछ नहीं भूला,तुम कैसे भूल गए ! धुँधले आसमान को साफ होने तक निहारा करनाजो गलतियाँ हुईं,उन्हें यूँ ही हँस कर दुबारा करनान शब्द से, न नयन से, अहसासों से इशारा करना एक लम्हे का सिरा पकड़ कर अनंत तक झूल गएमैं कुछ नहीं भूला,तुम कैसे भूल गए ! कैसे कह दूँ, उन कदमों …

कविवार (My Sunday Poetry)

क्योंकि वह पुरुष है….। वह अपने दर्द छिपाता हैनहीं कहता किसी से कुछवह जितना अधिक टूटता है उतना अधिक मुस्कुराता हैवह नहीं खीझ सकता है, हर छोटी-बड़ी बात परऔर रो तो खैर सकता ही नहीं वहक्योंकि वह पुरुष है…..। घर और बाहर के मध्य स्थिर सेतुउसका सब कुछ किसी और के हेतुअपने लिए नहीं कुछक्योंकि …

कविवार (My Sunday Poetry)

यह अंबर नीलम-नीलम-सा हैयह पर्वत कुछ हरित-हरित-सासुरम्य सिंदूरी श्रृंगार-साज करये पूरी शाम सुहागन लगती है। रजत कणों से चन्द्रमा भरा हैस्वर्ण-आभा से भानु तेजोमयकिरणों के तारों से उलझ करचंचल नदी मनभावन लगती है। कभी सावन घन सघन-सघन हैकभी बसंत वलित इंद्रधनुषमयकभी वसुंधरा पुष्पवसना होकरसहज सृजित सुहावन लगती है। कुछ तुम मुझमें रंग नवल भर दोऔर …

कविवार (My Sunday Poetry)

कविवार तेरे लहजे में तल्खियाँ अभी भी बाकी हैं बहुतकोई बात नहीं,हम थोड़ा-सा इंतजार और कर लेंगें इन हालातों के सिलसिले खत्म हुए नहीं अभीचलो, इन हालातों से हम थोड़ा प्यार और कर लेंगें मेरी गलतियों पर आप बस यूँ ही मुस्कुराती रहेंहमारा क्या है,हम ये गलतियाँ हजार और कर लेंगें इन दरवाजों में बंद …

कविवार (My Sunday Poetry)

जिन आँखों मे हमने छिपी हुई बेबसी देखी हैउसी के साए में हमने थोड़ी-सी जिंदगी देखी है सब कुछ हार कर भी मुझे सब कुछ मिल गयाजबसे जीतने वाले की आँखों में खुशी देखी है उन्होंने नजरें तो चुरा लीं मुझसे बातें करते-करतेमगर मैंने इसी अदा में उनकी आशिकी देखी है वो जो हँसते हैं …

कविवार (My Sunday Poetry)

वो रात भी ना जाने क्या अजब रात थीमैं रोता रहा और बाहर भी बरसात थी न गम छिपा ही सकें, न गम बता ही सकेंकुछ बोला नहीं, मगर कुछ बड़ी बात थी उसने सब कभी खत्म कर डाला था जहाँअब ये जाना, वहीं से तो मेरी शुरुआत थी इस सूरज से कोई पूछो दर्द …

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