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Welcome to My New Poetry Blog

Be yourself; Everyone else is already taken.

— Oscar Wilde.

This is the first post on my new blog. I’m just getting this new blog going, so stay tuned for more. Subscribe below to get notified when I post new updates.

कविवार (My Sunday Poetry)

‌संध्या को इन किरणों ने रक्तिम गुलाबी कर दिया
भोर में स्वर्णिम आभा ने कोष नभ का भर दिया
न रजत की रश्मियां,न मणियों की मनुहार मांगूं
बस मुझे आज थोड़ा रंग बासंती कर देना।

ओस की मधु-बिंदुओं के भीतर उत्तप्त आग देखा
मैंने पराजय की थकन में विजय का अनुराग देखा
न निराशा का धुंधलका,न आशा की चकाचौंध चाहूं
बस मुझे आज थोड़ा रंग बासंती कर देना।

नयनों के पानी के ऊपर सपनों के लेख ठहरे हुए हैं
जो स्वप्न जितने अधूरे हैं उतने अधिक गहरे हुए हैं
न अपूर्णता की टीस और न संपूर्णता का दंभ मांगूं
बस मुझे आज थोड़ा रंग बासंती कर देना।

इनसे जुड़ी, उनसे जुड़ी सौ-सौ कहानी बन गयी
जितनी घड़ियां जी चुका वो सब निशानी बन गयी
न सफर की वेदना,न तो रुकने का विश्राम मांगूं
बस मुझे आज थोड़ा रंग बासंती कर देना।

कविवार (My Sunday Poetry)

हम तेरी मोहब्बत में तेरे हो गए हैं इतना ज्यादा
कि अब आईने में भी तेरी ही सूरत नजर आती है

इन आँखों में नींद वाली कभी रात नहीं आती है
सुना है,तेरी चौखट पर ही अब शाम ठहर जाती है

जिंदगी के लम्हे कभी मुश्किल न थे जीने के लिए
जाने क्यों ये लम्हे समझने में सदियाँ गुजर जाती हैं

चाँद लुटाता रहा खुद चाँदनी टुकड़ा-टुकड़ा टूट कर
पूनम की रात में उसकी झोली फिर से भर जाती है

जिंदगी से जिंदगी भर बस मुस्कुराने का वादा कर लो
फिर देखना, ये जो तकदीर है, वो कैसे सँवर जाती है !

कविवार (My Sunday Poetry)

हाँ,ये सच है कि गाँव के आँगन में एक दीवार पड़ चुकी है
और दोनों हलकों की सारी जमीन बंट चुकी है
बराबर-बराबर
मेरे और तुम्हारे मकान भी अब अलग-अलग हैं
मगर भाई अब भी तू मेरा ही है, मैं तेरा ही हूँ।

तुम उस शहर में बस गए,मैं इस शहर में बस गया
तुम्हारे बच्चे सिर्फ तुम्हारे हैं और मेरे बच्चे सिर्फ मेरे
हमने बदल लिए हैं तरीके होली और दिवाली मनाने के
अब हम त्योहारों पर एक रंग के कपड़े भी नहीं पहनते
मगर भाई अब भी तू मेरा ही है, मैं तेरा ही हूँ।

याद है वो बचपन, जब माँ एक रोटी तुझे देती थी
दूसरी मुझको और फिर तीसरी तुझे
हम होड़ करते थे अपनी रोटियाँ पहले खत्म करने की
मेरा बस्ता तू , तेरा मैं उठाता था
तेरी जीत मेरी भी जीत थी और तेरी हार मेरी भी हार
अब दोनों के जीत-हार के मायने भले बदल गए हों
मगर भाई अब भी तू मेरा ही है, मैं तेरा ही हूँ।

अब जब भी किसी कोने में बैठा होता हूँ तो जानता हूँ
कि तुम नहीं आकर बोलोगे ‘धप्पा’
और पड़ोस के सुरेन्दर चाचा से ऊँचा घर बनाने का सपना
नहीं कर सकते हम पूरा संग-संग
शायद रिश्ते भी रेलगाड़ी की तरह हैं
कुछ आगे बढ़ो तो कुछ पीछे छूट जाते हैं
ये सच है या नहीं, ये नहीं जानता
मगर भाई अब भी तू मेरा ही है, मैं तेरा ही हूँ।

कविवार (My Sunday Poetry)

उड़ते हैं,दूर जाते हैं फिर लौट आते हैं घोंसलों में
इन परिंदों का अपना कभी ये आस्मां नहीं होता

हमारे और तुम्हारे बीच में एक दर्द का रिश्ता है
जो दिल में दर्द न होता तो कोई रिश्ता नहीं होता

हम शुक्रमंद हैं हमेशा अपनी सारी गलतियों के
जो वे गलतियाँ न होतीं तो ये तजुर्बा नहीं होता

हमें मिल न सको तब भी जरा मिलते-जुलते रहो
कभी-कभी यूँ मिल लेने से कोई घाटा नहीं होता

दो छोर को मिलने के लिए एक रास्ता जरूरी है
लोग मिलते नहीं जब तक कोई जरिया नहीं होता।

कविवार (My Sunday Poetry)

इन कोहरों के बीच एक धुँधला रस्ता दिखता है
जो जाता है सीधा सूर्य की पहली किरण तक

मैंने शब्दों के फैलाव को देखा है छूकर हाथों से
वो पहुँच ही पाएँ न कभी मौन के आवरण तक

तुम अपने ह्रदय में जैसी तरंगें उठाया करते हो
वही भाव पसर जाता है धरती तक, गगन तक

श्वासों में जब तक प्रेम की मदिर मिठास न घोलो
तब तक वो पहुँचेगीं कैसे मन में बसे घुटन तक

वो पूछते हैं ये प्रयत्न यूँ ही कब तक करते रहोगे
मैं बोलता हूँ, अपने विजय तक या मरण तक ।

कविवार(My Sunday Poetry)

लम्हों के सिलसिलों में कुछ भी न ठहर पाएगा
वो भी गुजर गया था, ये भी गुजर जाएगा

तुमने जो बातें कही, वो खत्म नहीं होंगी कभी
बातों में जो असर था,दूर तक वो असर जाएगा

भीड़ में अपना चेहरा मिलाने से पहले सोच लो
तू अब से बस भीड़ का ही हिस्सा नजर आएगा

हर प्यास की यहाँ एक आखिरी तारीख होती है
सब्र रख, तेरे हलक में भी समंदर उतर जाएगा

चिंगारियाँ उड़ाने की अब और न कोशिश करो
तेरा शौक पूरा होगा,किसी का घर उजड़ जाएगा

इन रास्तों पर बस तेरा चलते रहना ही बहुत है
मंजिल न भी मिली तो तेरा क्या बिगड़ जाएगा!

कविवार (My Sunday Poetry)

कोई और वजह है ही नहीं तुम्हारी शिकायत करने की
तुम कुछ ज्यादा ही सुंदर हो बस इतनी-सी शिकायत है

मैं तुम्हें कैसे बताऊँ तोल कर अपनी चाहत की तासीर को
बस जिंदगी से थोड़ी-सी ज्यादा है,ये जो तुमसे मोहब्बत है

एक दूजे को देखकर इन दिनों वो हँसते हैं कुछ ज्यादा ही
हमे यकीन है दोनों के बीच में बहुत ही गहरी नफरत है

न आग लगी, न चिंगारी, ये शहर फिर भी जल गया यूँ ही
वो जो उड़ती-फिरती बातें थीं,ये सब उसकी ही करामत है

अब और ये न कहना कि इसने वो किया, उसने ये किया
ये तेरी जिंदगी जो कुछ भी है, वो बस तेरे ही बदौलत है !

कविवार (My Sunday Poetry)

जीते-जीते जब हम जीने लगे तब ये जाना
इस दुनिया को हम दुनिया समझ लिए हद से ज्यादा।

हार आखिर न थी, जीत अंतिम न थी
दुःख रहा भी नहीं, सुख बसा भी नहीं
फिर भी जाने क्यूँ इनकी वजह से यूँ ही
हम रो लिए हद से ज्यादा, हँस लिए हद से ज्यादा।

तेरे घर का पता पूछते – पूछते हम
अपने घर का ही देखो पता भूल बैठे
अपनी बेफिक्री में इतने बेफिक्र थे हम
कि इन अजनबी राहों पर चल लिए हद से ज्यादा।

तारे चू कर गिर गए धूप की दाह से
और साँझ की परछाईं धूप को खा गई
दोष सपनों का न था, दोष आँखों का था
इन आँखों ने खुद में सपने भर लिए हद से ज्यादा।

इस कहानी का अंत कभी होना नहीं है
कल जहाँ ठहरी थी,फिर वहीं से चलेगी
जिंदगी इतनी ज्यादा जिंदगी थी ही नहीं
यूँ ही जिंदगी को हम जिंदगी कर लिए हद से ज्यादा।

कविवार (My Sunday Poetry)

तुमने मेरे भीतर जितना कुछ पाना चाहा है
हम उससे ज्यादा तुझमे अपना खो कर बैठे हैं

एक हादसा भूलने को हमें दूसरा हादसा चाहिए
हम इन हादसों के इतने आदी हो कर बैठे हैं

इस दरिया के पार जाने की जिन्हें इतनी पड़ी है
वो पहले से अपनी नाव खुद ही डुबो कर बैठे हैं

ये चेहरे जो बयां करते हैं,ये इन चेहरों में नहीं होते
ये लोग बड़े सयाने हैं, ये चेहरों को धो कर बैठे हैं

तुम समझो, न समझो, मुझको अपनी हकीकत
हम तुम्हें सपना समझ आँखों में सँजो कर बैठे हैं!

कविवार (My Sunday Poetry)

यूँ तो शिकायतें हमें पहले भी कम न थीं
मगर सुना है, तेरे शहर की हवा अब ज्यादा खराब है

इन चेहरों पर पहले से ही जाने कितने नकाब थे
मगर इन दिनों नकाबों के ऊपर एक और नकाब है

इस भागदौड़ की कोई मंजिल दिखी नहीं अब तक
कभी पहुँचना कहीं नहीं है, बस रस्ते बेहिसाब हैं

थोड़ी हवा,थोड़ा पानी खोजेगीं आने वाली पीढ़ियाँ
फिर भी ये लोग बस पैसे जोड़ने के खातिर बेताब हैं

जवाब मिला ही नहीं यहाँ किसी भी सवाल का
इसलिए जो कुछ भी है यहाँ, सब बहुत लाजवाब है !

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