कविवार (My Sunday Poetry)

कर्ण की अंतिम सुबह

आज युद्ध निर्णायक
कुरु के म्लान सैन्यदलों का अब मैं ही सेनानायक
आज युद्ध निर्णायक।

कर्म और कर्त्तव्य की कुछ भिन्न गति है,नहीं जानता
धर्म या फिर धारणा में छिपी उन्नति है, नहीं जानता
उधर केशव का शिविर, इधर सुयोधन है शिविरपति
किधर प्रगति है और किधर अवनति है,नहीं जानता।

अब कुछ और न कहेगी जिह्वा, बोलेंगे बस खर शायक
आज युद्ध निर्णायक।

प्राण शापित,ज्ञान शापित,शापित मन,शापित तन है
जब माता भी हुई न माता,तब शापित पूरा जीवन है
गुरु ने भक्ति को छल समझा,माता ने समझा कलंक
बस एक सुयोधन ही जिसने दिया मुझे अवलम्बन है

आभार यदि कुछ भार भी है तो यह भार मुझे सुखदायक
आज युद्ध निर्णायक।

देखूँगा मैं, अर्जुन की गांडीव में सच में कितना बल है
यह ह्रदय आज पूर्ण प्रशांत, तनिक भी नहीं विकल है
हे वासुदेव!यदि मरण ही मेरे तन की गति की सीमा है
तब भी ये मरण शत जीवन से अधिक सुखद,सफल है

हे पिता भानु, वर दो, जग बोले, पुत्र तेरा हर विधि लायक
आज युद्ध निर्णायक।

कविवार (My Sunday Poetry)

इनकी हस्ती ही क्या है, ये गर्दिशों के जमाने जाएँगें
बात तो बिगड़ेगी नहीं,बस कुछ लोग पहचाने जाएँगें

इन हरी डालियों ने छिपा रखे कितने काँटे गिरेबां में
लोग देख ही लेंगे सारे, जब भी ये पत्ते पुराने जाएँगें

ये दिल के दर्द की बात है, कोई व्यर्थ अफसाना नहीं
जब तुमने ही पूछा नहीं तो हम किसे सुनाने जाएँगें

वो बोलते हैं उनको हमारी अब याद कभी आती नहीं
आज हम उन्हें उनके सपनों में जरा आजमाने जाएँगें

जिन लम्हों में सुकून है,वहाँ तो जीना बड़ा आसान है
जिद है हमारी हम एक नयी उलझन सुलझाने जाएँगें !

कविवार (My Sunday Poetry)

जो मेरे भीतर है वो मेरा कितना अपना है
जमाने को मैं भला यह राज बता दूँ कैसे

दिल का दर्द ही मेरी उम्र भर की पूँजी है
तुम्हें सुना कर इस पूँजी को लुटा दूँ कैसे

जो जता दिया वो सौदा है, प्यार है ही नहीं
प्यार उनसे है तो उनको प्यार जता दूँ कैसे

आँसुओं में वे बहे नहीं, बस आह बह गयी
जिनके दम पर ये आँसू हैं उन्हें बहा दूँ कैसे

बड़ी मुश्किल से द्वार पर एक दीप जला है
आँधियों के डर से ये दीपक मैं बुझा दूँ कैसे !

कविवार (My Sunday Poetry)

बात अपने दिल की बहुत सारी कहनी थी उनको
बातों का सिलसिला वो थोड़ा आगे बढ़ाते तो सही

उन्हें एक बार फिर समेट कर सँवार देते हम जरूर
टूट कर वो हमारे सामने कभी बिखर जाते तो सही

हमने सुना है, मोहब्बत पर अब यकीन नहीं उनको
ये यकीन करने से पहले वो हमें आजमाते तो सही

अपना मन खामोश करते यदि तो वे हमें समझ लेते
सितारे झलक जाते, बस वो बत्तियाँ बुझाते तो सही

ये जो मुश्किल हालात हैं, ये बदल जाते बहुत पहले
वे इन हालातों से जरा नजरें अपनी मिलाते तो सही !

कविवार (My Sunday Poetry)

कैसे कह दूँ मैं कि इस सफर में कितने मोड़ आए हैं
जितना हासिल है, उससे ज्यादा पीछे छोड़ आए हैं

हर ठहराव पर जितने नये रिश्ते बना लिए हैं हमने
उनसे ज्यादा कई पुराने रिश्तों को हम तोड़ आए हैं

चमकती चाँदनी की रौशनी में इतरा रहे हैं जो लोग
वे अभी शाम में धूप की परतों को सिकोड़ आए हैं

धरती की गहराई तक गई है जड़ उस पुराने पेड़ की
यूँ ही नहीं डाल के पत्ते गगन से नाता जोड़ आए हैं

इस दौर को उस दौर से तोलने की कोशिश न करना
जितने भी दौर आए हैं यहाँ,सब बड़े बेजोड़ आए हैं!

कविवार (My Sunday Poetry)

यशोधरा के प्रति

आलि!ये जो अश्रुबिंदु दृग-द्वार से मेरे अनुगत हुए हैं
ये हर्ष का दुंदुभि नाद है, मेरे सिद्धार्थ तथागत हुए हैं।

यह नहीं सत्य, उन्होंने त्यज दिया मुझे
या मैं उनका किंचित भी व्यवधान बनी
सत्य है यह उनके सचेतन आरोहण में
मैं भाग्यवती उनका प्रथम सोपान बनी

इस आरोहण से बहुविध ताप जगत के विगत हुए हैं
ये हर्ष का दुंदुभि नाद है, मेरे सिद्धार्थ तथागत हुए हैं।

प्रिया हूँ उनकी, तुमने ये कैसे सोच लिया
मुझे न पता था प्रिय का संभाव्य संन्यास
मैं सोयी न थी, बस राहुल को लेकर संग
लेटी थी उस रात प्रशमित कर निज श्वास

मैंने भी चुना गृह में वैराग्य, लोग अब अवगत हुए हैं
ये हर्ष का दुंदुभि नाद है, मेरे सिद्धार्थ तथागत हुए हैं।

वे बुद्ध हुए, अरुद्ध हुए,किया जग में प्रसृत
तप-ज्ञान-प्रभा-सुधा सनातन मोक्षकारिणी
उनके इतना बनने में, मैं भी बनी उतना ही
यह यशोधरा भी हुई उतनी ही यशोधारिणी

उनके प्रयत्नों से दुर्लंघ्य पथ सुलंघ्य, अनाहत हुए हैं
ये हर्ष का दुंदुभि नाद है, मेरे सिद्धार्थ तथागत हुए हैं।

कविवार (My Sunday Poetry)

खुद राह पर चलते नहीं और रहबर का पता पूछते हैं
किनारे पर खड़े होकर भी वे समंदर का पता पूछते हैं

अपनी हद से ऊपर कभी उठ भी न पाएँ जरा-सा वो
मगर सुना है, इन दिनों सबसे अंबर का पता पूछते हैं

किसी तरह से वे महफिल में एक नजर देख लें हमको
उनकी नजरों से ही हम उनकी नजर का पता पूछते हैं

जो मिल गया उसकी कीमत को बिल्कुल बिसार दिया
अमृत बेच कर अब बाजारों में जहर का पता पूछते हैं

दुनिया में छा कर भी अपनी मिट्टी की गंध याद रखना
थके राही साँझ में फिर से अपने घर का पता पूछते हैं !

कविवार (My Sunday Poetry)

यूँ ही नहीं हमने आपको कर डाला इस हद तक मजबूर
बिना शिद्दत के कभी ख्वाहिशों में असर पैदा नहीं होता

मेरे दिल को समझना है तो ठहर कर मेरे नयनों को देखो
दिल तो एक बंद कोठरी है,इसमें कोई झरोखा नहीं होता

हम जीतें या हारें, हमारी कोशिश जग याद रखेगा बरसों
आग बुझ जाने भर से राख का ढेर तुरन्त ठंढा नहीं होता

क्या गलत है, क्या सही है, ये सब वक्त्त पर छोड़ दो तुम
यहाँ अदालतों में भी कभी जल्दी कोई फैसला नहीं होता

जो हुआ सो हुआ,अभी आगे बहुत कुछ और भी होना है
इस तकदीर की किताब में कोई आखिरी पन्ना नहीं होता !

कविवार (My Sunday Poetry)

बाजार में तुम दो पल ठहर कर देख लो हमको
आज हम भी इस शहर में जरा मशहूर हो जाएँ

तेरे चेहरे से जुल्फें हटाना हमारा कसूर ही सही
ये कसूर एक बार कर लें, फिर बेकसूर हो जाएँ

हर हार एक और कोशिश करने का ही इशारा है
न जाने किस कोशिश में अर्जियाँ मंजूर हो जाएँ

जो पीछे मुड़ कर देखते नहीं,वे लोग मतलबी हैं
जिस रास्ते ने मंजिल दी उससे कैसे दूर हो जाएँ

कमी और कहीं नहीं, हमारे इरादों में ही होती है
वर्ना हम जो भी होना चाहें यहाँ, जरूर हो जाएँ !

कविवार (My Sunday Poetry)

ये कैसा बीसवां साल लगा !

न सपनों का व्यापार हुआ
न उत्सव, न त्यौहार हुआ
न बाजारों में मेले ही दिखे
ना ही झूलों का जाल लगा
ये कैसा बीसवां साल लगा !

न सफर हुआ,न सवारी चली
न द्वार खुले,न खिड़की खुली
बच्चों के शोर-शराबे के बिना
ये मोहल्ला बेजार,बेहाल लगा
ये कैसा बीसवां साल लगा !

वो मिले कभी तो थके मिले
चेहरे भी नकाब से ढँके मिले
जो कभी चाँदी-सा चमकते थे
उनका भी हुलिया कंगाल लगा
ये कैसा बीसवां साल लगा !

भूख दिखी, लाचारी दिखी
हवा में उड़ती बीमारी दिखी
ना जाने भाग्य के सूरज पर
कितना लंबा ग्रहणकाल लगा
ये कैसा बीसवां साल लगा !

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