कविवार (My Sunday Poetry)

कुछ सावन यहाँ बिन बरसे ही बीत गए
कुछ कलियाँ बिन खिले ही झुलस गईं
कुछ दीप जले बिन टूट गए चौखट पर
कुछ मालाएँ गूँथने से पहले बिखर गईं

तुमको देखा और तुम्हारे सपने भी देखे
इस कहानी की बस इतनी ही कहानी है
जो बात मन में है वह मन में ही रहने दो
न तो तुम्हें सुननी है,ना ही मुझे सुनानी है

वो पत्थर भी होते तो हम देवता बना लेते
वो बरस भी पड़ते तो आँखों में समा लेते
बस इतना दुःख है हम उन्हें समझ न पाएँ
समझ जाते तब खुद को भी समझा लेते

मगर वो दूर जाकर भी भला कहाँ जाएँगें
ये सारी गलियाँ फिर मुड़कर यहीं आती हैं
इन नदियों का क्या है, ये जल से जन्मी हैं
थोड़ा आगे जाकर सागर में समा जाती हैं!

कविवार (My Sunday Poetry)

कुछ पल ऐसे भी आते हैं
आँसू भी थाती बन जाते हैं
दुःख जब हद से गुजरता है
वो ह्रदय को पत्थर करता है
इतिहास खुद को दुहराता है
कुछ भूली हुई बात बताता है
समय के बहुत-से झरोखे हैं
ये दौर हम पहले भी देखे हैं
कल जैसी ही यह कहानी है
आज फिर आँखों में पानी है
ये कैसी अजब-सी लाचारी है
जाने किसकी अगली बारी है
कुछ भूले-बिसरे हुए मेले हैं
हम फिर से बहुत अकेले हैं
मगर आशा एक बहती धारा है
मन का जीवटपन कब हारा है
हर गहराई की एक अच्छाई है
उसके कुछ आगे फिर ऊँचाई है
धरा की अब तक जो कहानी है
मानव के साहस की निशानी है
ये सारे दर्द कभी तो कम होंगें
इनके ऊपर फिर से हम होंगें !

कविवार (My Sunday Poetry)

नैया ये डगमग डोल रही
ये दिशाएँ रौरव बोल रहीं
गर्जन-तर्जन, हुंकार उठा
सागर में हाहाकार उठा
हे नाविक,तुम फिर भी छोड़ पतवार न जाना
कुछ भी हो जाए बस हिम्मत हार न जाना।

समय ने संजाल रचाया है
हमसे कुछ भेद छिपाया है
ये जाल सघन हम तोड़ेंगें
समय का रुख भी मोड़ेंगें
भाग्य पर अपना भूल सहज अधिकार न जाना
कुछ भी हो जाए बस हिम्मत हार न जाना।

इस पथ से जो भी जाते हैं
वे शाम को वापस आते हैं
जिसने भी देखा अँधेरा है
उसके ही हिस्से में सवेरा है
भटकी निराशा में इस अंधकार के पार न जाना
कुछ भी हो जाए बस हिम्मत हार न जाना।

जितना भी पराग बिखरता है
उपवन उतना ही निखरता है
ज्वाला के पथ पर बढ़ना है
तुमको ही फिर सब गढ़ना है
प्रलय भी पुकारे फिर भी छोड़ संसार न जाना
कुछ भी हो जाए बस हिम्मत हार न जाना।

कविवार (My Sunday Poetry)

बहुत आँसू बरसे, बहुत आह निकली
खोजा मगर ना कोई भी राह निकली
बहुत रुदन-क्रंदन,करुण विलाप देखा
साँसों में घुटन और मन में संताप देखा

प्रलय के प्रहर को अब तो पार कर दो
हे दाता!हे ईश्वर!अब उबार कर दो।

तुम्हीं ने रचाया है और तुम्हीं ने सजाया
ये जो कुछ बना है,सब तुम्हीं ने बनाया
तेरी ही रचना है, इसे कैसे भी बचना है
अब क्या सिखाना,अब क्या परखना है

परखे तुम बहुत हो, अब उद्धार कर दो
हे दाता!हे ईश्वर!अब उबार कर दो।

क्या पाप, क्या पुण्य, कभी और देखेंगें
ये दौर जो बीते तो कोई नया दौर देखेंगें
निकट ये लाचारी है, विकट महामारी है
मुझे माँगना है,आगे मर्जी बस तुम्हारी है

करुणा का हे करुणाकर!विस्तार कर दो
हे दाता!हे ईश्वर!अब उबार कर दो।

समय है तो संबल है,मन है तो मनोबल है
जो कुछ भी नहीं तब हमें बस तेरा बल है
सारे दाँव गवाएँ हैं और सभी खेल हारे हैं
बस इतना सहारा है कि हम तेरे सहारे हैं

पहले भी किया है, फिर चमत्कार कर दो
हे दाता!हे ईश्वर!अब उबार कर दो।

कविवार (My Sunday Poetry)

मैं कुछ नहीं भूला,तुम कैसे भूल गए !

धुँधले आसमान को साफ होने तक निहारा करना
जो गलतियाँ हुईं,उन्हें यूँ ही हँस कर दुबारा करना
न शब्द से, न नयन से, अहसासों से इशारा करना

एक लम्हे का सिरा पकड़ कर अनंत तक झूल गए
मैं कुछ नहीं भूला,तुम कैसे भूल गए !

कैसे कह दूँ, उन कदमों का जो प्रयास था,झूठा था
कैसे कह दूँ, जो सुनहला-सा इतिहास था,झूठा था
कैसे कह दूँ, जो तेरे पास था, मेरे पास था,झूठा था

उन अमोल भावनाओं की तुम तो कीमत वसूल गए
मैं कुछ नहीं भूला,तुम कैसे भूल गए !

रोता हूँ,लेकिन दिखाता नहीं, कुछ ऐसा संसार मिला
न तेरा सुख मिला,न दुःख, बस उलझा व्यापार मिला
एक सूखी-सी नदी मिली,एक भटका-सा प्यार मिला

करुण हास्य बन गए तारे और ये आँसू बन फूल गए
मैं कुछ नहीं भूला,तुम कैसे भूल गए !

कविवार (My Sunday Poetry)

क्योंकि वह पुरुष है….।

वह अपने दर्द छिपाता है
नहीं कहता किसी से कुछ
वह जितना अधिक टूटता है उतना अधिक मुस्कुराता है
वह नहीं खीझ सकता है, हर छोटी-बड़ी बात पर
और रो तो खैर सकता ही नहीं वह
क्योंकि वह पुरुष है…..।

घर और बाहर के मध्य स्थिर सेतु
उसका सब कुछ किसी और के हेतु
अपने लिए नहीं कुछ
क्योंकि जिस दिन वह अपने लिए कुछ चाहेगा
यह दुनिया उसे शोषक कह देगी
युगों से कर रहा प्रयत्न
मगर सफलता का श्रेय किसी और को दे देता है
क्योंकि वह पुरुष है…..।

वह अपनों से हारने के लिए जीता है
उसका प्रेम किसी प्रदर्शन के लिए नहीं है
और उसे नहीं सुननी अपनी प्रशंसा
वह विराट है, वह क्षुद्र नहीं होना चाहता
वह अपने और अपनों के बीच बंटना नहीं चाहता
फैलना चाहता है
वह भरभरा नहीं सकता, थरथरा नहीं सकता
फूट नहीं सकता, फट नहीं सकता
क्योंकि वह पुरुष है…..।

नहीं लिखी किसी महाकवि ने उस पर कोई कविता
जबकि सृष्टि के श्रृंगार में वह भी था बराबर का भागीदार
उसने सिर्फ दायित्व उठाए हैं,अधिकार माँगा ही नहीं
और उसे अधिकार चाहिए भी नहीं
वह तो बस इतना चाहता है
उससे जुड़े लोग,उसके कारण न हों दुःखी
भले उसका कुछ भी हो जाए,उसे नहीं परवाह
क्योंकि वह पुरुष है…..।

कविवार (My Sunday Poetry)

यह अंबर नीलम-नीलम-सा है
यह पर्वत कुछ हरित-हरित-सा
सुरम्य सिंदूरी श्रृंगार-साज कर
ये पूरी शाम सुहागन लगती है।

रजत कणों से चन्द्रमा भरा है
स्वर्ण-आभा से भानु तेजोमय
किरणों के तारों से उलझ कर
चंचल नदी मनभावन लगती है।

कभी सावन घन सघन-सघन है
कभी बसंत वलित इंद्रधनुषमय
कभी वसुंधरा पुष्पवसना होकर
सहज सृजित सुहावन लगती है।

कुछ तुम मुझमें रंग नवल भर दो
और कुछ मैं तुमपर रंग नए डालूँ
रंगों से जब रंग मिल जाते हैं तब
ये पूरी प्रकृति ही पावन लगती है।

कविवार (My Sunday Poetry)

कविवार

तेरे लहजे में तल्खियाँ अभी भी बाकी हैं बहुत
कोई बात नहीं,हम थोड़ा-सा इंतजार और कर लेंगें

इन हालातों के सिलसिले खत्म हुए नहीं अभी
चलो, इन हालातों से हम थोड़ा प्यार और कर लेंगें

मेरी गलतियों पर आप बस यूँ ही मुस्कुराती रहें
हमारा क्या है,हम ये गलतियाँ हजार और कर लेंगें

इन दरवाजों में बंद रहने की हनक बहुत है,मगर
हम इस दर पर थोड़ी मिन्नतें-मनुहार और कर लेंगें

मेरी कोशिशों का अब तक असर न हुआ तो क्या
हमने सोचा है, ये कोशिश एक बार और कर लेंगें !

कविवार (My Sunday Poetry)

जिन आँखों मे हमने छिपी हुई बेबसी देखी है
उसी के साए में हमने थोड़ी-सी जिंदगी देखी है

सब कुछ हार कर भी मुझे सब कुछ मिल गया
जबसे जीतने वाले की आँखों में खुशी देखी है

उन्होंने नजरें तो चुरा लीं मुझसे बातें करते-करते
मगर मैंने इसी अदा में उनकी आशिकी देखी है

वो जो हँसते हैं इन महफिलों में हर एक बात पर
मैंने तन्हाई में उनकी आँखों में एक नदी देखी है

उनका नजरिया है कि वे रातों में अँधेरे देखते हैं
हमने तो बस तारों की दमकती रोशनी देखी है!

कविवार (My Sunday Poetry)

वो रात भी ना जाने क्या अजब रात थी
मैं रोता रहा और बाहर भी बरसात थी

न गम छिपा ही सकें, न गम बता ही सकें
कुछ बोला नहीं, मगर कुछ बड़ी बात थी

उसने सब कभी खत्म कर डाला था जहाँ
अब ये जाना, वहीं से तो मेरी शुरुआत थी

इस सूरज से कोई पूछो दर्द अकेलेपन का
पहले अँधेरा था, मगर तारों की बारात थी

एक वादा था सदा साथ निभाने का उससे
आज यादें साथ हैं, कल वो खुद साथ थी!

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