कविवार (My Sunday Poetry)

तेरे-मेरे मिलने की बस इतनी-सी कहानी थी
एक प्यासा सागर था, एक नदिया दीवानी थी
फिर और हुईं जो बातें, वे सब हो ही जानी थीं
एक प्यासा सागर था, एक नदिया दीवानी थी।

ये पुष्प-लता,पवन के संग यूँ ही नहीं नाची थी
इन दोनों के बीच कोई पहचान पुरानी थी
एक प्यासा सागर था, एक नदिया दीवानी थी।

बिना वजह ये चाँद रात के संग नहीं जागा था
उसको अपने दिल की कोई बात बतानी थी
एक प्यासा सागर था,एक नदिया दीवानी थी।

अनजान डगर पर बेवजह चल दिए तो ये जाना
ये गलियाँ तो हमें जन्मों से जानी-पहचानी थीं
एक प्यासा सागर था, एक नदिया दीवानी थी।

तेरी आँखों के लहरों से हमने कब बचना चाहा
हमें तो इनमें ही डूब कर सीपियाँ चुरानी थीं
एक प्यासा सागर था, एक नदिया दीवानी थी।

कविवार (My Sunday Poetry)

इतनी जल्दी कोई ख्याल बना लेना न मेरे बारे में तुम
अभी इस दिल की पूरी दास्तां तुमको सुनाया ही नहीं

एक लम्हा ऐसा मिलता कि तुम्हें कह देता सारी बातें
बरस पर बरस गुजरे मगर लम्हा कभी आया ही नहीं

तुम वफा न सही कोई सजा ही दे देते गुनाह-ए-प्यार का
हम ये गुनाह करते रहे और तुमने सजा सुनाया ही नहीं

चलने की ऐसी फितरत अपने मन मे हमने बना ली है कि
खुद को भी हमने अपनी मंजिल का पता बताया ही नहीं

केवल खुद को छोड़ बस इसलिए सारे पराए लगते हैं हमें
हम अपने में रहे जीते,किसी को अपना बनाया ही नहीं !

कविवार (My Sunday Poetry)

कच्चा मकान था तो इत्मीनान था
पक्के मकानों में थोड़ी नींद कम आती है
इन कमरों में उजाले की यूँ तो कमी नहीं है
बस कुछ चाँद कम दिखता है,थोड़ी धूप कम आती है।

बारिशों से बचने को एक छत क्या ढाला हमने
कई दिन बीते मगर बारिश में भींग ही न पाएँ हम
दिन और रात के अंतर को जब हमने मिटा डाला
तब कुछ कम सुबह होती है,थोड़ी शाम कम आती है।

अच्छे वक्त की चाहत में हम वो घर तो छोड़ आएँ
मगर फिर वक्त ही मिला नहीं वक्त को परखने का
जरूरत से ज्यादा जरूरत के सामान तो हैं लेकिन
थोड़ी प्यास कम लगती है, थोड़ी भूख कम आती है।

खुद को बड़ा करने में इतने बड़े हो गए हम
कि खुद को छोड़ कर सब लगने लगे हैं छोटे
यूँ तो लोगों से अभी भी हम करते हैं वैसी ही बातें
बस कुछ आँसू कम बहते हैं,थोड़ी हँसी कम आती है।

कविवार (My Sunday Poetry)

जन्नत के बरसों की मन्नत आज हो गयी है पूरी
अब हिमालय की वादी कुछ साँस अधिक लेगी
रावी के जल में भी एक आदिम-सी हलचल है
ये जो नक्शे हैं कागज के,उनकी सूरत बदलेगी।

आखिर ये धारा कैसी धारा है
जिसने अपना ही घर बिगाड़ा है
कोई संधि, कोई कानून नहीं
जो हमारा था, वो हमारा है
तर्कों से नहीं,ओज के सूर्य से बर्फ की परतें पिघलेगीं
अब हिमालय की वादी कुछ साँस अधिक लेगी ।

इस पार नहीं, उस पार नहीं
अब सीमाएँ स्वीकार नहीं
अपना हक खुद से प्राप्त करो
यह देगा तुम्हें संसार नहीं
यूँ सिसक-सिसक कर बोलो कितनी सदियाँ गुजरेगीं
अब हिमालय की वादी कुछ साँस अधिक लेगी ।

अब अगर-मगर की बात नहीं
अपने हित पर ही आघात नहीं
जो कभी था हमारे हाथों में
क्यूँ रख दूँ फिर उस पर हाथ नहीं
माँ भारती की प्रतिमा अखंड फिर से सजेगी,सँवरेगी
अब हिमालय की वादी कुछ साँस अधिक लेगी ।

कविवार (My Sunday Poetry)

जब तक प्यार न हो जाए ये तकरार ही चलने दो
इसी बहाने कुछ दिन अपना वास्ता तो होगा

ये बात और है कि तुम तक कभी हम पहुँच पाए नहीं
मगर तुम हो तो तुम तक पहुँचने का कोई रास्ता तो होगा

जानते हो,ये फूल क्यूँ लुटाते हैं सुगंध इन फिजाओं में
उन्हें है यकीन कोई भँवरा उनको तलाशता तो होगा

उनको गुमां है कि हम कभी उन्हें याद आते हैं नहीं
इस गुमां में भी हमारी याद का अहसास-सा तो होगा

आसमाँ छूने की चाह में अपनी एड़ियाँ तो उठाओ जरा
पल भर ही सही ये आसमाँ कुछ पास-सा तो होगा !

कविवार (My Sunday Poetry)

हाँ,खुद पर हमने इतना सितम कर दिया है
तुम्हें सोचना थोड़ा कम कर दिया है

जहाँ पर हुईं थी शुरू बातें ये सारी
वहीं जाकर उनको खतम कर दिया है
तुम्हें सोचना थोड़ा कम कर दिया है !

मेरी आँखों के आँसू न पहचाने कोई
मैंने बारिशों से आँखों को नम कर दिया है
तुम्हें सोचना थोड़ा कम कर दिया है !

तुम दो मुझे जख्म, तुम्हें है इजाजत
मैंने जख्मों को अपना मरहम कर दिया है
तुम्हें सोचना थोड़ा कम कर दिया है !

इस दुनिया के सच कुछ लगे इतने भारी
कि सच को ही मैंने भरम कर दिया है
तुम्हें सोचना थोड़ा कम कर दिया है !

वे मिले भी तो क्या मिले

इतने अरसे बीते,वे मिले भी तो क्या मिले
जब भी मिले बस यादों के दरमियां मिले

जो भी बीती,हम पर बीती,वो सबसे क्यूँ कहूँ
लोग बैठे हैं कि उन्हें हँसने का एक मौका मिले

अपने गाँव की जमीन और आँगन वो बेच आया है
कि इस शहर में उसे दो कमरे का एक मकां मिले

सैर करना है तो कभी शमशानों का सैर कर आओ
हो सकता है, वहीं से जीने का कुछ तजुर्बा मिले

बुरा दौर एक इम्तिहान है, उसे हँस कर गुजार लो
वो मुकाम ही क्या जो बिना किसी इम्तिहां मिले !

मैंने कब चाहा था

मैंने कब चाहा था,ये सारा चमन हो मेरा
दो मुट्ठी आसमान को मेरे नाम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

लरजते दिन तुम्हारे हों,खनकती रात तुम्हारी हो
मेरे हिस्से में तुम एक रंगीन शाम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

सुना है, शोहरत की जमीन भरी हुई है फिसलनों से
इन महफ़िलों में मुझको थोड़ा-सा बदनाम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

उम्र भर का साथ पाने की ख्वाहिश बहुत बड़ी है
दो पल में ही दिल की तुम बातें तमाम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

कितने भी महल चुनवाओ उसमें समा न पाओगे
दिलों में घर बनाने का एक छोटा-सा काम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

साँसों के सिलसिले में जाने कौन अंतिम कड़ी हो…..

साँसों के सिलसिले में जाने कौन अंतिम कड़ी हो
हर साँस को इसलिए हम बड़ी शिद्दत से जीते हैं

हर कदम पर मौत ने बाजी बिछा रक्खी यहाँ
जो जीते हैं दुनिया में वो बस किस्मत से जीते हैं

इन मंज़रों में डूब जाना आसां बहुत है यारों
इन मंज़रों से निकलते हैं वही जो ताकत से जीते हैं

जीने वाले ज़िन्दगी का नाम तक भूले हैं
वो ज़िन्दगी को बस जीने की आदत से जीते हैं

दुनिया के इस बाज़ार की हलचल कब थमी है
इन हलचलों में आओ, कुछ फुर्सत से जीते हैं

हमारे और उनके फ़लसफ़े में बस फर्क है इतना
वो नफ़रत से जीते हैं, हम मोहब्बत से जीते हैं।

जिन्हें इस काफिले के जश्न से तकलीफ है…..

जिन्हें इस काफिले के जश्न से तकलीफ है
उन्हें कह दो कि ये काफिले यूँ ही नहीं बनते

कड़ी धूप में चिड़ियों ने चमन से चुने थे तिनके
सूखी डाल पर ये सुंदर घोंसले यूँ ही नहीं बनते

तुमने उनसे कभी दिल से बातें की नहीं होंगी
रिश्तों के बीच के ये फासले यूँ ही नहीं बनते

जमाने की नीयत में कमी कुछ तो होगी जरूर
वर्ना अदालतों में इतने मामले यूँ ही नहीं बनते

किसी को अपनी यादों से कर देना होता है मजबूर
ये जो चाहत है, उसके सिलसिले यूँ ही नहीं बनते!

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