कविवार (My Sunday Poetry)

कोई और वजह है ही नहीं तुम्हारी शिकायत करने की
तुम कुछ ज्यादा ही सुंदर हो बस इतनी-सी शिकायत है

मैं तुम्हें कैसे बताऊँ तोल कर अपनी चाहत की तासीर को
बस जिंदगी से थोड़ी-सी ज्यादा है,ये जो तुमसे मोहब्बत है

एक दूजे को देखकर इन दिनों वो हँसते हैं कुछ ज्यादा ही
हमे यकीन है दोनों के बीच में बहुत ही गहरी नफरत है

न आग लगी, न चिंगारी, ये शहर फिर भी जल गया यूँ ही
वो जो उड़ती-फिरती बातें थीं,ये सब उसकी ही करामत है

अब और ये न कहना कि इसने वो किया, उसने ये किया
ये तेरी जिंदगी जो कुछ भी है, वो बस तेरे ही बदौलत है !

ashishlekhni द्वारा प्रकाशित

I am a poet,shayar,kavi and a civil servant. A differently abled person,in wheelchair,want to contribute something positive to the society through my own poems.

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