कविवार (My Sunday Poetry)

कुछ दास्तां ऐसी भी हैं, जो कभी सुनायी न गयी
कुछ आँसू की बूँदें बनीं मगर आँखों से बहायी न गयी

हमने जुबां से कभी की नहीं तेरे इश्क की चर्चा कहीं
ये कसूर नजरों का था इससे सच्चाई छिपायी न गयी

फूलों को मसला भी तो वो हाथों में खुशबू छोड़ गए
सब कुछ लुटाने की फितरत उनसे भुलायी न गयी

उजड़े हुए घरों के बीच से रस्ते बना लेंगें ये लोग
अगर गिरी हुई दीवार ये जल्दी से उठायी न गयी

बस मुस्कुरा कर देख लो निभ जाएँगें रिश्ते सभी
ये रीत इतनी भारी न थी जो तुमसे निभायी न गयी।

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ashishlekhni द्वारा प्रकाशित

I am a poet,shayar,kavi and a civil servant. A differently abled person,in wheelchair,want to contribute something positive to the society through my own poems.

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