कविवार (My Sunday Poetry)

कच्चा मकान था तो इत्मीनान था
पक्के मकानों में थोड़ी नींद कम आती है
इन कमरों में उजाले की यूँ तो कमी नहीं है
बस कुछ चाँद कम दिखता है,थोड़ी धूप कम आती है।

बारिशों से बचने को एक छत क्या ढाला हमने
कई दिन बीते मगर बारिश में भींग ही न पाएँ हम
दिन और रात के अंतर को जब हमने मिटा डाला
तब कुछ कम सुबह होती है,थोड़ी शाम कम आती है।

अच्छे वक्त की चाहत में हम वो घर तो छोड़ आएँ
मगर फिर वक्त ही मिला नहीं वक्त को परखने का
जरूरत से ज्यादा जरूरत के सामान तो हैं लेकिन
थोड़ी प्यास कम लगती है, थोड़ी भूख कम आती है।

खुद को बड़ा करने में इतने बड़े हो गए हम
कि खुद को छोड़ कर सब लगने लगे हैं छोटे
यूँ तो लोगों से अभी भी हम करते हैं वैसी ही बातें
बस कुछ आँसू कम बहते हैं,थोड़ी हँसी कम आती है।

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ashishlekhni द्वारा प्रकाशित

I am a poet,shayar,kavi and a civil servant. A differently abled person,in wheelchair,want to contribute something positive to the society through my own poems.

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2 Comments

  1. खुद को बड़ा करने में इतने बड़े हो गए हम
    कि खुद को छोड़ कर सब लगने लगे हैं छोटे
    यूँ तो लोगों से अभी भी हम करते हैं वैसी ही बातें
    बस कुछ आँसू कम बहते हैं,थोड़ी हँसी कम आती है।
    लाज़वाब ! बहुत पसंद आईं !

    Liked by 1 व्यक्ति

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