मैंने कब चाहा था

मैंने कब चाहा था,ये सारा चमन हो मेरा
दो मुट्ठी आसमान को मेरे नाम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

लरजते दिन तुम्हारे हों,खनकती रात तुम्हारी हो
मेरे हिस्से में तुम एक रंगीन शाम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

सुना है, शोहरत की जमीन भरी हुई है फिसलनों से
इन महफ़िलों में मुझको थोड़ा-सा बदनाम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

उम्र भर का साथ पाने की ख्वाहिश बहुत बड़ी है
दो पल में ही दिल की तुम बातें तमाम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

कितने भी महल चुनवाओ उसमें समा न पाओगे
दिलों में घर बनाने का एक छोटा-सा काम कर दो
बस इतना ही बहुत है !

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ashishlekhni द्वारा प्रकाशित

I am a poet,shayar,kavi and a civil servant. A differently abled person,in wheelchair,want to contribute something positive to the society through my own poems.

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