जिन्हें इस काफिले के जश्न से तकलीफ है…..

जिन्हें इस काफिले के जश्न से तकलीफ है
उन्हें कह दो कि ये काफिले यूँ ही नहीं बनते

कड़ी धूप में चिड़ियों ने चमन से चुने थे तिनके
सूखी डाल पर ये सुंदर घोंसले यूँ ही नहीं बनते

तुमने उनसे कभी दिल से बातें की नहीं होंगी
रिश्तों के बीच के ये फासले यूँ ही नहीं बनते

जमाने की नीयत में कमी कुछ तो होगी जरूर
वर्ना अदालतों में इतने मामले यूँ ही नहीं बनते

किसी को अपनी यादों से कर देना होता है मजबूर
ये जो चाहत है, उसके सिलसिले यूँ ही नहीं बनते!

ashishlekhni द्वारा प्रकाशित

I am a poet,shayar,kavi and a civil servant. A differently abled person,in wheelchair,want to contribute something positive to the society through my own poems.

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